चार दीवारों के बीच एक खिड़की जैसा था वो पोर्टल

Started by christophermorrm, Jun 14, 2026, 07:56 AM

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christophermorrm

मैं चंडीगढ़ में रहता हूँ। अपने छोटे से कमरे में। मैं एक कस्टमर सपोर्ट एजेंट हूँ, लेकिन घर से काम करता हूँ। कंपनी ने पिछले साल सबको वर्क फ्रॉम होम कर दिया। पहले तो अच्छा लगा। फिर धीरे-धीरे ये एहसास हुआ कि चार दीवारें धीरे-धीरे मेरे दिमाग को खा रही हैं। ना दोस्त, ना चहल-पहल, ना कोई ऑफिस की गपशप। बस सुबह लॉगिन, शाम लॉगआउट।

बीच में जो छोटा-सा ब्रेक मिलता, मैं बस बेड पर लेट जाता। छत की तरफ देखता। क्या देखना है? वही पंखा, वही दीवार, वही बोरियत। फिर एक दिन मेरे कान में ईयरफोन लगे हुए थे, कुछ गाना बज रहा था, और अचानक एक विज्ञापन आया। एक आवाज़ बोली, "थोड़ा मज़ा करो, क्योंकि ज़िन्दगी एक ही बार है।" मैंने विज्ञापन पर क्लिक किया और पहुंच गया Vavada official portal पर।

पहली नज़र में ये वैसा ही लगा जैसा ऑनलाइन स्टोर होता है। बस यहाँ सामान नहीं, खेल बिकते हैं। मुझे कोई उम्मीद नहीं थी। ना मैं पैसे कमाने आया था, ना कोई करियर बनाने। बस वो बोरियत मार रही थी, और मुझे कुछ करना था। कुछ भी।

मैंने रजिस्ट्रेशन किया। बिना पैसे डाले। बस एक डमी अकाउंट। उन्होंने मुझे 50 फ्री स्पिन दिए। मैंने सोचा, देखते हैं क्या होता है। पहली स्पिन से ही 15 रुपये मिल गए। दूसरी से 7। ऐसे चलता रहा। उन 50 स्पिनों में मैंने कुल 340 रुपये जमा कर लिए। बिना अपना एक पैसा लगाए।

लेकिन वो पैसे निकालने के लिए मुझे कम से कम एक बार अपना पैसा जमा करना था। 340 रुपये देखकर मेरा लालच थोड़ा जागा। मैंने 200 रुपये जमा किए। क्योंकि मैंने सोचा, अगर 200 गए भी तो मैंने 340 फ्री में पाए थे। फिर भी फायदा ही है।

मैंने असली खेलना शुरू किया। Vavada official portal पर एक "ब्लैकजैक टूर्नामेंट" चल रहा था। मुझे ब्लैकजैक का तनिक भी ज्ञान नहीं था। मैंने पहले कुछ मिनट ट्रेनिंग मोड में बिताए। फिर असली टेबल पर चला गया। छोटे-छोटे दांव। 20-50 रुपये के। पहले चार हाथ हारा। सोचा, बस हो गया। पर पाँचवें हाथ में दोगुना करके 100 रुपये लगा दिए। डीलर के पास 15 थे, उसने एक और कार्ड लिया और बस्ट हो गया। मेरे पास 18 थे। जीत। अगले हाथ में फिर से जीत। ऐसा लगा जैसे मैं गेम समझने लगा हूँ।

एक घंटे में मैं अपने 200 रुपये और फ्री स्पिन के 340 रुपये को मिलाकर 1,100 रुपये पर पहुँच गया। मैंने रुकने का फैसला किया। पैसे निकाल लिए। 1,100 रुपये। मेरे अकाउंट में।

इतनी सी जीत थी, पर मेरे चेहरे पर हँसी थी। क्योंकि मुझे लगा, मैंने बोरियत को हरा दिया है। कम से कम उस एक रात के लिए।

अगले हफ्ते मैंने एक नियम बनाया। हर शनिवार रात, वर्क फ्रॉम होम की वीकेंड पर, मैं Vavada official portal खोलूंगा। सिर्फ 300 रुपये डालूंगा। उसके बाद चाहे कुछ हो जाए, निकलूंगा। मैंने ये नियम तोड़ा नहीं।

दो हफ्ते बाद एक ऐसी रात आई जिसने सबकुछ बदल दिया। मैं रूलेट खेल रहा था। मेरा एक अजीब सा फील था कि आज नंबर 23 आएगा। क्यों? पता नहीं। कभी-कभी दिमाग बिना वजह कुछ तय कर लेता है। मैंने 50 रुपये 23 नंबर पर लगा दिए। गेंद घूमी। रुकी... 23। 50 रुपये का 35 गुना मिलता है। 1,750 रुपये। एक ही स्पिन में। मेरे अकाउंट का बैलेंस अब 2,400 के करीब था। मैंने तुरंत विदड्रॉल प्रेस किया।

लेकिन यहाँ कहानी असली मोड़ लेती है। मैंने उस पैसे का क्या किया? मैंने अपने कमरे के लिए एक छोटा सा पौधा खरीदा। एक गुलाब का पौधा। 300 रुपये का। बाकी पैसे बचा लिए। क्योंकि मैंने सोचा - अगर चार दीवारों के बीच एक जीवित चीज़ होगी, तो बोरियत कम होगी। वो पौधा लगाकर मैंने उसकी देखभाल शुरू कर दी। पानी देना, धूप में रखना।

आज उस पौधे पर एक कली आई है। लाल। मैं उसे देखता हूँ तो मुझे वो रात याद आती है। जब मैंने 23 नंबर पर दांव लगाया था। शायद ये मूर्खता थी। शायद नहीं। लेकिन उस मूर्खता ने मेरे कमरे में हरियाली ला दी। मैं अब भी Vavada official portal पर आता हूँ। लेकिन अब मैं बोरियत से बचने नहीं, बल्कि थोड़ा उत्साह लेने आता हूँ। फर्क है ना?

मैंने सीखा कि जीत और हार दोनों अस्थायी हैं। लेकिन संतुलन जो आप बनाते हैं, वो स्थायी होता है। मैं अब रोज़ ऑफिस का काम करता हूँ, फिर पौधे को पानी देता हूँ, फिर कभी-कभी खेलता हूँ। और जब मैं खेलता हूँ, तो दिल में कोई लालच नहीं होता। बस एक शांत सी उम्मीद होती है। वैसे ही जैसे उस कली के खिलने की होती है।

बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं, "कितना जीत लिए?" मैं कहता हूँ, "वो पौधा देखो। वही मेरी जीत है। बाकी सब तो सिर्फ नंबर हैं।" और हाँ, मैं आज भी हर शनिवार को 300 रुपये ही डालता हूँ। चाहे पिछले हफ्ते हारा हूँ या जीता। ये नियम मेरा ढाल है, और मैंने अपनी ढाल कभी नीचे नहीं रखी।

शायद इसी में मेरी असली जीत छुपी है। कि मैं वहाँ रुक गया जहाँ मुझे रुकना चाहिए था। वो पौधा मुझसे कहता है, "बस इतना काफ़ी है।" और मैं मान जाता हूँ।